देखभाल की कीमत

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हमारे स्वयंसेवक वह पुल थे जिन्होंने  हमेंं कोविड  महामारी की दूसरी लहर से बाहर निकलने का रास्ता दिखाया। वे दिन-रात एक करके आवश्यक चिकित्सा संसाधनों की खरीद और सत्यापन के लिए काम कर रहे थे और उन व्यक्तियों को इन संसाधनों से जोड़ रहे थे  जिन्हें इनकी सबसे अधिक आवश्यकता थी।

हम भले ही कोरोना की दूसरी लहर से पूरी तरह बाहर ना निकले हो , लेकिन हर कोई सहमत हो सकता हैं कि हम अंत के करीब हैं। और ये इन अनगिनत व्यक्तियों के बिना संभव नहीं हो पाता जिन्होंने अपना समय, ऊर्जा और संसाधनों को देश की भारी चिकित्सा प्रणाली के लिए समर्पित किया हो । 

 जब  स्वयंसेवकों  ने स्वेच्छा से दूसरे के जीवन को बचाने के लिए खुद को जोखिम मेंं डाला, उस समय ना केवल अपने शारीरिक स्वास्थ्य को खतरे मेंं डाल रहे थे बल्कि किसी की जान बचाने की जिम्मेंदारी लेकर, कोविड राहत कार्य में लगे स्वयंसेवकों ने अपने  मानसिक स्वास्थ्य को भी खतरे मेंं डाला।

स्वयंसेवकों का संघर्ष

हमेंं पिछले दशक के दौरान शुरू हुए मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम के लिए धन्यवाद करना चाहिए, जिसके कारण लॉकडाउन के दौरान लोगों मेंं मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं मेंं भाग लेना एक प्राथमिकता रही हैं। माना की कई लोगों के लिए यह एक देखभाल एक विलासिता हैं, लेकिन यह एक शुरुआत हैं। 

पिछले महीने की शुरुआत मेंं, हमने COVID-19 टास्क फोर्स पर एक लेख पोस्ट किया इसके कारण  मुझे टास्क फोर्स की विभिन्न टीमों के प्रमुखों के साथ साक्षात्कार मेंं भाग लेने का अवसर मिला। इस साक्षात्कार के दौरान, मेंरा ध्यान इस विशेष समुदाय के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं की ओर गया जो थे कोविड -19  राहत के लिए काम कर रहें थे। 

“जब मैं सुबह उठी, तो मुझे एक संदेश मिला। उसमेंं कहा गया था, वह अब नहीं रहा ।”

यह आन्या नाम की एक स्वयंसेवक का उद्धरण हैं, जिसने अपने और अपनी टीम के संघर्षों को साझा किया।दुर्भाग्य से, यह ही एक इकलौती  घटना नहीं थी, श्रीमान इंद्रपाल नेवारे जो की उपाय एनजीओ की कोविड-19 टास्क फोर्स की आवश्यकता जुटाने वाली टीम के प्रमुख थे उन्होंने एक घटना का जिक्र किया जहाँ उन्हे सुबह के वक्त करीब 10 बजे एक फोन आया, और कुछ ही समय में पूरी टीम उस मरीज के लिए मदद खोजने में लग गई । दोपहर में 3 बजे के करीब उनके टीम के पास एक और फोन आया जिससे पता चला कि इतने प्रयासों के बाद भी मरीज बच नहीं पाया। बहुत सी ऐसी घटनाओ में से ये एक घटना थी । 

“मैंने सोचा था कि मैं एक स्थिति का वर्णन कर सकता हूं कि दुख को व्यक्त करो । दुःख, हालाँकि, एक अवस्था नहीं बल्कि एक प्रक्रिया बन जाता हैं ”  सीएस लुईस

कुछ समय के लिए दुख ,शोक और क्षति कोविड टास्क फोर्स में कार्य कर रहे स्वयंसेवकों  के लिए दैनिक जीवन का यंग बने रहे। जब उन्होंने अपनी पत्नी के नुकसान का अनुभव किया, तो सीएस लुईस ने किसी प्रियजन की मृत्यु की तुलना विच्छेदन से की। ऊपर के उद्धरण मेंं, उन्होंने दु:ख के अनुभव को एक प्रक्रिया के रूप मेंं ठीक ही रखा हैं। 

यह एक ऐसा अनुभव हैं जो समय के साथ गुजरता हैं इसलिए हम इसके साथ समझौता कर सकते हैं।

उसी दशक के भीतर जब लेखक ने अपनी पुस्तक  ए ग्रीफ अब्ज़र्व्ड (A grief observed) मेंं दुःख के बारे मेंं बताया –  मनोचिकित्सक कुबलर-रॉस ने दुःख को  पांच-चरणों मेंं बांटा – इनकार, क्रोध, सौदेबाजी, अवसाद और स्वीकृति ।

ज्यादातर मौते जिनका सामना स्वयंसेवकों को करना पड़ा रहा था , उनमेंं से अधिकांश लोग ना तो उनके दोस्त थे ना ही  संबंधी। स्वयंसेवकों ने पूर्ण अजनबियों के निधन की खबर सुनी, जिनका जीवन अचानक से उन पर निर्भर था। स्वयंसेवकों  ने मरीजों के लिए भले ही एक घंटे काम किया हो मगर उस एक घंटे में उन्होंने उस अजनबी को बचाने की पूरी जिम्मेंदारी ले ली थी, ये लोग (मरीज और स्वयंसेवक) जैसे ही  एक-दूसरे के जीवन मेंं आए, एक को छीन लिया गया। स्वयंसेवकों ने अपने स्वयं के दुःख का अनुभव किया । समय की व्ययस्थता और अपने काम की तात्कालिकता के कारण वे इस दुःख को स्वीकार भी नहीं कर पा रहे थे । 

सुश्री ज्योति ने हमारे साथ विशेष रूप से एक  गंभीर सप्ताह का वाकया साझा किया जहां उन्हें 5 मौतों के बारे मेंं सुनना पड़ा। ये वे लोग थे जिन्हें वह जानती थी  लेकिन उनके पास इतना समय नहीं था कि वे इस खबर के  साथ बैठ सकें और इसे स्वीकार  कर सकें क्योंकि अन्य  दूसरों लोगों  को भी उनकी सहायता की आवश्यकता थी।

उन्हें  न केवल अनगिनत मौतें  बल्कि काम के साथ आने वाली असहायता और निराशा की भावना भी पीड़ित करती हैं। टीम के प्रत्येक स्वयंसेवक ने  8 से 10 वास्तविक उपलब्ध लीड खोजने के लिए एक दिन मेंं लगभग सौ फोन किए। अस्पताल मेंं सिर्फ एक बेड  खोजने के लिए कम से कम 20 से 30 फोन करने पड़ रहे थे । कई बार सवाल न  केवल संसाधनों को प्राप्त करना था, बल्कि अक्सर रोगियों और उनके परिवार के सदस्यों को उपलब्ध संसाधनों का लाभ उठाने के लिए मनाने का कार्य था जो कि  चिढ़चिड़ाहट पैदा कर देता था ।

मेंंटल हेल्थ काउंसलर अनुष्का करिरा के साथ एक बातचीत मेंं सामने आया कि स्वयंसेवकों के बीच एक आम चिंता कोविड के दौरान अपने  ऊपर लगे लांछन के कारण  उनकी सहायता प्रणाली का नुकसान था। स्वयंसेवा मेंं पुण्य हैं , फिर भी, दुख की बात हैं कि इसे अक्सर वे लोग भूल जाते हैं जिनकी स्वयंसेवकों को सबसे अधिक आवश्यकता होती हैं। 

परित्याग, अस्वीकृति और अलगाव उनके दिमाग को घेर लेते हैं, धीरे-धीरे उनके लचीलेपन पर हमला करते हैं।

करीब से देखने पर पता चलता हैं कि ये वैध भावनाएँ दोनों तरफ मौजूद हैं। स्वयंसेवकों को अपने परिवारों द्वारा समर्थन की कमी के कारण अस्वीकार कर दिया गया हैं। इसके विपरीत यह भी सच हैं  कि स्वयंसेवक दूसरों की मदद करने के विकल्प को  चुनकर अपने और अपने परिवार के प्रति चिंता की कमी दिखाता हैं।

पिछले कुछ महीने चुनौतीपूर्ण रहे हैं और  बहुत लोगों  के लिए यह अभी भी जारी हैं। हम केवल अपना हिस्सा कर सकते हैं और आशा करते हैं कि जो हम नियंत्रित नहीं कर सकते हैं  वह स्वयं अपना  ख्याल रखता हैं ।

हम क्या कर सकते हैं?

“आप सही रहेंगे तभी  दूसरों  की मदद  कर पाओगे” – अनुष्का करिरा 

काम की प्रकृति हमेंं अपनी सीमाओं को आगे बढ़ाने और घंटों तक काम करते रहने के लिए मना सकती हैं । आप जो महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं, उससे ब्रेक लेना एक स्वार्थी काम की तरह लग सकता हैं। लेकिन आप  सिर्फ इंसान हो। दूसरों की मदद करने के लिए  ब्रेक लेना, अच्छा भोजन करना और अच्छी नींद लेना महत्वपूर्ण हैं। 

अनुष्का करिरा का सुझाव हैं कि  अगर आपको नीचे दिए गए लक्षण होते हैं तो ध्यान दे । 

  1.  निरंतर घटती ऊर्जा / डिमोटिवेशन
  2. आपके शरीर मेंं दर्द जो बिना किसी स्पष्ट शारीरिक कारण के होता हैं 
  3. लंबे समय तक चुप रहना 
  4. बिना कारण के रोना 

यदि आप इनमेंं से कोई भी लक्षण देखते हैं तो यह आपके लिए ब्रेक लेने का समय हैं। सही समय पर ब्रेक लेने से आप  गंभीर परिणामों से बचे रहेंगे । अपराध बोध के दर्द से लड़ें और अपने लिए समय निकालें। इस अवधि मेंं उन कामों को करें जो आपको पूर्ण और अपने आप से संपर्क मेंं महसूस कराते हैं।

ऐसा करने के लिए डॉ. करिरा  ने हमारे साथ कुछ गतिविधियां साझा की हैं। आप वह चुन सकते हैं जो आपको सबसे अच्छा लगे!

  1. अपने करीबी दोस्तों या परिवार के साथ  बातचीत करें
  2. ध्यान करे  (सांस लेना, मुख्य रूप से साँस छोड़ना)
  3. अपने आप को सभी प्रकार के ध्यान भटकाने वाली चीजों से दूर रखे (खासकर के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से )
  4. रोजाना घूमने जाए , हो सके तो नंगे पाँव घास पे घूमें 
  5. अपने पालतू जानवर के साथ खेले 
  6. पानी मेंं मछली या आकाश मेंं बादलों के शांत क्षणों को देखें।

डिजिटल डिटॉक्स (इसका मतलब हैं की इलेक्ट्रॉनिक संसाधन जैसे मोबाईल,लैपटॉप से दूर रहना ) भी एक ऐसा शब्द था जिस पर हमने चर्चा की। इन भावनाओं का आप अनुभव कर सकते हैं जब स्वयंसेवा करना चुनौतीपूर्ण होता हैं ।  इस जाल मेंं पड़ने से बचना चाहिए कि सोशल मीडिया इन सब से  निपटने के लिए सबसे अच्छा बचाव  हैं।  जब आपने अपने आराम करने के घंटे तय कर लिए हैं तब अपना फोन को सिर्फ आपत्कालिक स्थिति में बजने के लिए छोड़ दे । इसी तरह आप अपने लिए कुछ समय निकाल पाएंगे । 

अनुष्का करिरा जैसे मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सक से संपर्क करना भी उचित हैं , खासकर यदि देखे गए लक्षण गंभीर हैं या लंबे समय से बने हुए हैं।

अच्छे मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए सामाजिक समर्थन बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। उपाय में हम स्वयंसेवकों की विभिन्न टीमों के भीतर इस सहायक वातावरण का निर्माण करते हैं। प्रत्येक टीम प्रमुख ने महसूस किया कि अपने स्वयंसेवकों के लिए एक सहायक, देखभाल करने वाले वातावरण को बढ़ावा देना उनकी जिम्मेंदारी हैं। उन्होंने टीम को प्रेरित रखने मेंं एक लीडर  की भूमिका पर जोर दिया हैं जब भी हमारी टीम को निराशा को सामना करना पड़ा, सभी टीम  लीडरो उन लोगों को ध्यान में रखने पर जोर दिया जिनकी मदद वे लोग कर सकते थे और सभी ने अपने काम को पूरे उत्साह से जारी रखा। सभी टीम लीडरो के पास ना सिर्फ एक दूसरे का समर्थन प्राप्त हैं बल्कि हमारे संस्थापक श्रीमान वरुण श्रीवास्तव जी का भी समर्थन प्राप्त हैं। 

ये वास्तव मेंं चुनौतीपूर्ण समय हैं। हम उन सभी साहसी और देखभाल करने वालों के लिए आभारी हैं जो हमेंं मजबूत रखने के लिए स्तंभ की तरह खड़े रहे हैं। आपके निरंतर प्रयासों के लिए धन्यवाद।

यह लेख इस उम्मीद से लिखा गया हैं कि इसके माध्यम से ना सिर्फ आपको अपने अनुभवों को साझा करना आसान होगा बल्कि आप स्वयं की चिंता करके अपने आप को 

अच्छा महसूस करवाएंगे जैसे आप दूसरों को कर रहे थे । 

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